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एपिसोड १: गर्मियों की वो पहली शाम और अनजाना खिंचाव
गर्मियों के दिन थे, और सूरज की तपिश अभी पूरी तरह ढली भी नहीं थी कि आसमान में अचानक बादलों ने डेरा डाल लिया था। हवा में एक अजीब सी भारीपन और नमी थी, जो इस बात का संकेत दे रही थी कि कुछ ही देर में बारिश होने वाली है।
राहुल अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ा था। उसका हाथ खिड़की के लोहे के ग्रिल पर था और वह बाहर सड़क की तरफ देख रहा था। उसकी उम्र अभी-अभी अठारह साल पूरी हुई थी। स्कूल की पढ़ाई खत्म हो चुकी थी, कॉलेज में दाखिले की प्रक्रिया चल रही थी, और उसके भीतर एक अजीब सा खालीपन और बेचैनी थी। वह न तो पूरी तरह बच्चा था और न ही कोई समझदार वयस्क; वह उम्र के उस मुहाने पर खड़ा था जहाँ शरीर और मन दोनों में एक नया तूफान उठ रहा होता है।
तभी नीचे मुख्य दरवाजे की घंटी बजी—एक तेज, गूंजती हुई आवाज जिसने राहुल के ख्यालों को तोड़ दिया।
नीचे के हॉल से रीना की खुशियों से भरी आवाज गूँजी। रीना राहुल की स्टेपमॉम (सौतेली माँ) थीं। पिछले कुछ सालों से वह इस घर में रह रही थीं, और उनके साथ राहुल का रिश्ता काफी सामान्य और शिष्टाचार वाला था। लेकिन उस दिन रीना के स्वर में एक अलग ही उत्साह था। वह चीखते हुए बोलीं, “प्रिया! आ गई मेरी जान! दरवाज़ा खोलो कोई!”
राहुल ने गहरी साँस ली और सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ाए। वह धीरे-धीरे नीचे उतर रहा था, और जैसे-जैसे वह ज़मीन पर पहुँच रहा था, उसके कान में एक नए और ताजे लहजे की हँसी सुनाई दे रही थी।
दरवाजे पर खड़ी वो शख्सियत
जब राहुल ने हॉल पार करके मुख्य दरवाजा खोला, तो उसके सामने जो दृश्य था, उसने अगले कुछ पलों के लिए उसकी साँसें रोक दीं।
दरवाजे की चौखट पर एक लड़की खड़ी थी। उसकी उम्र महज उन्नीस साल थी—राहुल से सिर्फ एक साल बड़ी। उसने एक सादा लेकिन आकर्षक सफेद कॉटन का टॉप और नीले रंग की फिटेड जीन्स पहन रखी थी, जो उसके युवा और कस कसे हुए शरीर को बखूबी ढाल रही थी। उसके लंबे, घने काले बाल सफर की थकान और उमस के कारण हल्के से उसके पसीने से भीगे हुए कंधों पर बिखरे हुए थे। उसके चेहरे पर हल्की सी पसीने की चमक थी, जो सूरज की आखिरी रोशनी में किसी ओस की बूँद की तरह चमक रही थी।