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Step Mom Ki Sister
Erotica

Step Mom Ki Sister

by Mr. X
Explicit
38,295 words
step mom

एक तूफानी रात में, जब यशवर्धन सिंघानिया की वसीयत पढ़ी जा रही थी, किसी को उम्मीद नहीं थी कि उनका अरबों का साम्राज्य उनके इकलौते बेटे देव को नहीं, बल्कि उनकी सौतेली बेटी अनन्या मल्होत्रा को मिलेगा। देव, जिसकी रगों में नफरत और गुस्सा दौड़ता है, अपनी सौतेली माँ की बहन को इस घर में कदम भी नहीं रखने देना चाहता। लेकिन अनन्या, अपनी शांत आँखों में गहरा दर्द लिए, एक ऐसे वादे को पूरा करने आई है जो उसे इस नफरत भरे महल में तीन साल तक बांधे रखेगा। क्या देव अपनी सौतेली बहन के प्रति अपनी नफरत को प्यार में बदल पाएगा, या यह रिश्ता सिर्फ बर्बादी की आग में जलेगा?

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Preview from chapter one

अक्टूबर की उस मनहूस शाम को जब आसमान से मटमैले, भारी बादल शहर पर एक गीले कफन की तरह उतर रहे थे, तब' सिंघाडिया मेंशन' की विशाल, पुरानी खिडकियों से केवल एक गहरा, दमघोंटू अंधकार छनकर भीतर आ रहा था. बाहर गुलमोहर के पुराने पेड हवा के बेदर्द थपेडों से इस तरह झूल रहे थे मानो किसी भयानक अनहोनी की आहट से कराह रहे हों.

यह मेंशन महज ईंटों और संगमरमर का ढांचा नहीं था; यह शहर के सबसे पुराने, सबसे रईस और भीतर से सबसे खोखले परिवार के पाखंड की एक ठंडी मजार थी. बाहर से इसके विशाल यूनानी खंभे, ऊंचे काले लोहे के फाटक और चारों तरफ फैली मखमली घास की क्यारियां जितनी पुरसुकून और आलीशान दिखती थीं, इसके भीतर की हवा में उतना ही कडवा जहर घुला हुआ था.

और आज, उस जहर की गंध कुछ ज्यादा ही तीखी थी.

घर के मुखिया, ठाकुर यशवर्धन सिंघाडिया को इस दुनिया से रुखसत हुए ठीक ग्यारह दिन बीत चुके थे.

ग्राउंड फ्लोर पर बने उस विशाल, महोगनी की लकडी से सजे' ग्रैंड लाइब्रेरी हॉल' में हवा इतनी ठहरी हुई थी कि कमरे के कोने में रखी पुरानी पीतल की दादाजी- घडी की हर एक' टिक- टिक' किसी की छाती पर भारी हथौडे की तरह बज रही थी. कमरे के बीचों- बीच रखे लंबे, काले नक्काशीदार ओक टेबल के इर्द- गिर्द परिवार के दूर- दराज के रिश्तेदार जमा थे. उनके चेहरों पर मातमी सफेद रंग के लिबास थे, लेकिन उनकी भूखी, बेचैन आंखें टेबल के सिरहाने बैठे बुजुर्ग वकील Mister देशपांडे के कांपते हाथों पर टिकी थीं.

उन सफेद कपडों के भीतर कोई मातम नहीं था; वहां केवल एक बदबूदार लालच तैर रहा था. हर कोई यह जानने के लिए अपनी सांसें रोके बैठा था कि बूढे यशवर्धन ने अपने अरबों के साम्राज्य, इस ऐतिहासिक मेंशन, और दर्जनों चाय के बागानों का मालिक किसे बनाया है.

लेकिन उस पूरी महफिल में एक इंसान ऐसा था, जिसके वजूद पर न तो किसी मातम का असर था, न ही उस वसीयत के पन्नों की कोई परवाह.

वह था देव सिंघाडिया.

पच्चीस साल का वह नौजवान, जो टेबल पर बैठने के बजाय कमरे के सबसे अंधेरे कोने में,

कांच की विशाल दीवार से पीठ टिकाए खडा था.

काले रंग की भारी लेदर जैकेट, नीचे सादी काली टी- शर्ट, और उंगलियों में फंसी आधी जली हुई सिगरेट. कमरे में सिगरेट पीने पर सख्त पाबंदी थी, यह उस खानदान का पुराना कायदा था—लेकिन देव के लिए कायदे हमेशा सिर्फ इसलिए बनते थे ताकि वह उन्हें अपने जूतों तले बेरहमी से कुचल सके. उसकी सिगरेट का नीला, कडवा धुआं लाइब्रेरी के पुराने पर्दों में घुल रहा था.

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