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Step Mom Ki Sister

3,974 words·20 min read

अक्टूबर की उस मनहूस शाम को जब आसमान से मटमैले, भारी बादल शहर पर एक गीले कफन की तरह उतर रहे थे, तब' सिंघाडिया मेंशन' की विशाल, पुरानी खिडकियों से केवल एक गहरा, दमघोंटू अंधकार छनकर भीतर आ रहा था. बाहर गुलमोहर के पुराने पेड हवा के बेदर्द थपेडों से इस तरह झूल रहे थे मानो किसी भयानक अनहोनी की आहट से कराह रहे हों.

यह मेंशन महज ईंटों और संगमरमर का ढांचा नहीं था; यह शहर के सबसे पुराने, सबसे रईस और भीतर से सबसे खोखले परिवार के पाखंड की एक ठंडी मजार थी. बाहर से इसके विशाल यूनानी खंभे, ऊंचे काले लोहे के फाटक और चारों तरफ फैली मखमली घास की क्यारियां जितनी पुरसुकून और आलीशान दिखती थीं, इसके भीतर की हवा में उतना ही कडवा जहर घुला हुआ था.

और आज, उस जहर की गंध कुछ ज्यादा ही तीखी थी.

घर के मुखिया, ठाकुर यशवर्धन सिंघाडिया को इस दुनिया से रुखसत हुए ठीक ग्यारह दिन बीत चुके थे.

ग्राउंड फ्लोर पर बने उस विशाल, महोगनी की लकडी से सजे' ग्रैंड लाइब्रेरी हॉल' में हवा इतनी ठहरी हुई थी कि कमरे के कोने में रखी पुरानी पीतल की दादाजी- घडी की हर एक' टिक- टिक' किसी की छाती पर भारी हथौडे की तरह बज रही थी. कमरे के बीचों- बीच रखे लंबे, काले नक्काशीदार ओक टेबल के इर्द- गिर्द परिवार के दूर- दराज के रिश्तेदार जमा थे. उनके चेहरों पर मातमी सफेद रंग के लिबास थे, लेकिन उनकी भूखी, बेचैन आंखें टेबल के सिरहाने बैठे बुजुर्ग वकील Mister देशपांडे के कांपते हाथों पर टिकी थीं.

उन सफेद कपडों के भीतर कोई मातम नहीं था; वहां केवल एक बदबूदार लालच तैर रहा था. हर कोई यह जानने के लिए अपनी सांसें रोके बैठा था कि बूढे यशवर्धन ने अपने अरबों के साम्राज्य, इस ऐतिहासिक मेंशन, और दर्जनों चाय के बागानों का मालिक किसे बनाया है.

लेकिन उस पूरी महफिल में एक इंसान ऐसा था, जिसके वजूद पर न तो किसी मातम का असर था, न ही उस वसीयत के पन्नों की कोई परवाह.

वह था देव सिंघाडिया.

पच्चीस साल का वह नौजवान, जो टेबल पर बैठने के बजाय कमरे के सबसे अंधेरे कोने में,

कांच की विशाल दीवार से पीठ टिकाए खडा था.

काले रंग की भारी लेदर जैकेट, नीचे सादी काली टी- शर्ट, और उंगलियों में फंसी आधी जली हुई सिगरेट. कमरे में सिगरेट पीने पर सख्त पाबंदी थी, यह उस खानदान का पुराना कायदा था—लेकिन देव के लिए कायदे हमेशा सिर्फ इसलिए बनते थे ताकि वह उन्हें अपने जूतों तले बेरहमी से कुचल सके. उसकी सिगरेट का नीला, कडवा धुआं लाइब्रेरी के पुराने पर्दों में घुल रहा था.

देव के चेहरे पर नजर डालना किसी तपते हुए लोहे को छूने जैसा था.

सख्त, तराशे हुए जबडे, माथे पर गिरे उलझे हुए घने काले बाल, और वे खौफनाक, ठंडी आंखें जिनमें पिछले दस सालों से सिर्फ एक ही चीज जलती दिखाई देती थी—अथाह, बे- लगाम नफरत. उस चेहरे पर अपने सगे बाप की मौत का एक कतरा भी मलाल नहीं था. हो भी कैसे सकता था? उस बाप ने पंद्रह साल पहले देव की सगी मां को जीते- जी मारकर एक दूसरी औरत को इस घर की मालकिन बनाकर बिठा दिया था. देव के लिए उसका बाप उसी दिन मर चुका था.

देव. कोने में बैठी उसकी बडी चाची ने मुंह बनाते हुए एक बनावटी सिसकी के साथ कहा, कम से कम आज के दिन तो यह बदतमीजी छोड दो. तुम्हारे स्वर्गीय पिता की अंतिम इच्छा पढी जाने वाली है, और तुम यहां सिगरेट का धुआं उडा रहे हो? कुछ तो मर्यादा रखो!

देव ने अपनी नजरें उस औरत की तरफ नहीं घुमाईं. उसने सिगरेट का एक बहुत लंबा, गहरा कश खींचा. अंगारे की लाल चमक उसके चेहरे पर एक सेकंड के लिए चमकी, और फिर उसने धुआं सीधे उस औरत की तरफ छोड दिया.

मर्यादा? देव की आवाज इतनी खुरदुरी, ठंडी और भारी थी कि कमरे में फुसफुसा रहे रिश्तेदारों की जुबानें एक पल में सिल गईं. जिस घर की दीवारों में गद्दारी और फरेब का चूना लगा हो, वहां मर्यादा की भीख मत मांगो, चाची. और मेरे बाप की अंतिम इच्छा? वह बूढा अपनी वसीयत में मेरे नाम अपनी जूतियों के सिवा कुछ छोड भी नहीं सकता. इसलिए यह तमाशा जल्दी खत्म करो. मेरी सिगरेट खत्म होने से पहले।

बदतमीज. जाहिल. चाचा ने फुसफुसाते हुए नजरें फेर लीं. किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि देव की आंखों में सीधी नजर डाल सके. वे जानते थे कि देव सिर्फ नाम का सिंघाडिया नहीं था; उसके खून में एक ऐसा जंगलीपन था जो किसी भी सीमा को नहीं पहचानता था.

तभी Mister देशपांडे ने अपना भारी, सोने के फ्रेम वाला चश्मा ठीक किया. उन्होंने मेज पर रखे पानी के ग्लास से एक घूंट भरा और अपने कांपते हाथों से उस लाल सील लगे भारी लिफाफे को खोला.

कागजों की चरमराहट सन्नाटे को चीरती हुई निकली.

हम. हम शुरू करते हैं, देशपांडे की बूढी आवाज गूंजी. मैं, यशवर्धन सिंघाडिया, पूरे होशोहवास में अपनी यह अंतिम वसीयत दर्ज करा रहा हूं. मेरे देहांत के पश्चात, सिंघाडिया ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के चालीस प्रतिशत शेयर्स सीधे मेरे इकलौते पुत्र, देव सिंघाडिया के नाम किए जाते हैं.

रिश्तेदारों के चेहरों पर हवाइयां उडने लगीं. कुछ के माथों पर पसीना चमकने लगा.

लेकिन, देशपांडे अचानक रुके. उनकी नजरें ऊपर उठीं और सीधे कोने में खडे देव के चेहरे पर जाकर ठहर गईं. देशपांडे के चेहरे पर एक अजीब सी बेबसी और खौफ था.

देव ने सिगरेट की राख को बिना ऐशट्रे के सीधे महोगनी के फर्श पर गिरा दिया. उसके होंठों पर एक कडवी, जानलेवा मुस्कान खिंच गई. मुझे पता था. उस बूढे की कब्र से भी कोई न कोई सडी हुई शर्त बाहर निकलेगी. पढो, देशपांडे. रुक क्यों गए?

देशपांडे ने एक भारी सांस ली और पन्ने को आगे पलटा.

लेकिन. इस पूरे साम्राज्य का मालिकाना हक, मुख्य ट्रस्ट की पावर ऑफ अटॉर्नी, और इस ऐतिहासिक' सिंघाडिया मेंशन' की संपूर्ण कस्टडी अगले तीन वर्षों तक देव सिंघाडिया को सीधे तौर पर नहीं सौंपी जाएगी।

पूरे हॉल में सन्नाटा खिंच गया. यहां तक कि दीवार घडी की आवाज भी जैसे धीमी पड गई.

तो किसे दी जाएगी? चाची की आंखें चमक उठीं. परिवार का सबसे बडा होने के नाते.

नहीं, मालती जी, देशपांडे ने सख्त लहजे में उन्हें टोका. उन्होंने अंतिम पन्ना सामने रखा. वसीयत की धारा चार के अनुसार, इस पूरे ट्रस्ट की लीगल एग्जीक्यूटर, मेंशन की एकमात्र कस्टोडियन, और देव के हर एक कारोबारी फैसले की वीटो पावर. स्वर्गीय कावेरी जी की छोटी बहन. यानी सुश्री अनन्या मल्होत्रा को सौंपी जाती है।

कमरे में जैसे बिजली गिर पडी.

देव के हाथ में फंसी सिगरेट एक झटके में फर्श पर गिर पडी.

उसकी उंगलियां वहीं हवा में मुट्ठी के रूप में इतनी जोर से भिंच गईं कि उसकी कलाई की

नसें नीली पडकर उभर आईं. उसकी पुतलियां सिकुडकर सुई की नोक जैसी हो गईं.

अनन्या मल्होत्रा.

वह नाम किसी खौलते हुए तेजाब की तरह देव के कानों से होता हुआ सीधे उसकी रूह में उतर गया.

कावेरी. वही सौतेली मां, जिससे देव ने अपनी जिंदगी के हर एक लम्हे में नफरत की थी. वही औरत जिसने उसकी अपनी मां को इस घर के अंधेरे कोनों में रो- रोकर मरने पर मजबूर कर दिया था. और अब. उस औरत के मरने के तीन साल बाद, उसका बाप अपनी पूरी सल्तनत, यह घर, और खुद देव की आजादी उसी औरत की छोटी बहन की झोली में डालकर मर गया था?

यह क्या बकवास है? देव के मुंह से एक धीमी, फुसफुसाती हुई आवाज निकली.

लेकिन उस फुसफुसाहट में छुपा खतरा इतना भयानक था कि देशपांडे अपनी कुर्सी पर दो इंच पीछे खिसक गए.

देव अंधेरे कोने से बाहर निकला. उसके लेदर बूट्स की भारी, गूंजती हुई आवाज फर्श पर किसी शिकारी के कदमों जैसी थी. वह टेबल के पास आया. उसने अपनी दोनों हथेलियां टेबल पर इस जोर से पटकीं कि कांच के पानी का ग्लास उछलकर फर्श पर चकनाचूर हो गया.

छनन्न!

कमरे में बैठी औरतें डर के मारे सहम गईं.

देव देशपांडे के चेहरे के बिल्कुल करीब झुक गया. उसकी आंखें खून की तरह सुर्ख हो चुकी थीं. उसकी सांसों से निकलती सिगरेट और गुस्से की तपिश देशपांडे के चेहरे को झुलसा रही थी.

उस औरत का नाम इस कागज पर कैसे आया, देशपांडे? देव की आवाज में एक भयानक ठहराव था, जैसे किसी जलजले से ठीक पहले समंदर का पानी पीछे हटता है. कावेरी मल्होत्रा के खानदान का एक भी कीडा अगर इस चौखट के भीतर कदम रखेगा, तो मैं इस पूरे मेंशन को डायनामाइट लगाकर उडा दूंगा! यह घर मेरा है! यह जमीन मेरी मां की कब्र पर बनी है!

देव बेटा. शांत हो जाओ. देशपांडे के हाथ कांप रहे थे. यह तुम्हारे पिता का कानूनी फैसला

है. इस पर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज के दस्तखत हैं. अगर तुमने अनन्या जी के अधिकार को चुनौती देने की कोशिश की, या उनके साथ कोई जबरदस्ती की. तो ट्रस्ट की एक- एक पाई सरकार के चैरिटी फंड में चली जाएगी. तुम सडक पर आ जाओगे, देव!

मुझे सडक की परवाह नहीं है! देव दहाड उठा. उसकी आवाज से छत पर लटके विशाल शैंडेलियर के क्रिस्टल थरथरा उठे. मैं उस औरत को इस घर में कदम नहीं रखने दूंगा! वह एक परजीवी है, अपनी उस मरी हुई बहन की तरह, जो सिर्फ सिंघाडिया खानदान की दौलत को नोचने आई है!

शायद आपको अपने शब्दों पर थोडा काबू रखना चाहिए, Mister देव सिंघाडिया।

एक आवाज आई.

वह आवाज न तो बहुत तेज थी, न ही उसमें कोई चीख थी.

मगर उस आवाज में एक ऐसा बर्फीला, शांत और अटूट ठहराव था जिसने देव की उस भयानक दहाड को भी बीच रास्ते में ही काट दिया.

हॉल के भारी, नक्काशीदार सागवान के दोहरे दरवाजे धीरे से खुले थे.

वहां, चौखट के ठीक बीचों- बीच वह खडी थी.

अनन्या मल्होत्रा.

छब्बीस साल की वह लडकी, जो किसी भी ऐंगल से उस लालची, चालाक परिवार की परछाईं नहीं लग रही थी जैसी देव ने अपने दिमाग में गढी थी.

उसने एक बेहद सादी, सफेदी की हद तक हल्की बादामी (Ivory) रंग की लिनन की साडी पहन रखी थी. कोई भारी गहने नहीं, सिर्फ कलाई में एक पतली, क्लासिक लेदर स्ट्रैप वाली घडी और कानों में छोटे- छोटे मोती. उसके लंबे, घने भूरे बाल पीछे एक ढीले जूडे में बंधे थे, जिनमें से कुछ लटें उसकी सुराहीदार, गोरी गर्दन पर बेतरतीब झूल रही थीं. चेहरे पर न कोई खौफ था, न कोई घमंड.

वहां सिर्फ एक गहरी, उदास, लेकिन अटल गंभीरता थी. उसकी बडी- बडी, बादामी आंखों में एक ऐसा गहरा सन्नाटा था जिसे देखकर कोई भी इंसान यह अंदाजा नहीं लगा सकता था कि उसके भीतर कितनी गहरी खामोशी दफन है.

उसके हाथ में एक साधारण, चमडे का पुराना ब्रीफकेस था.

कमरे में मौजूद हर रिश्तेदार की नजरें उस पर टिक गईं.

लेकिन देव.

देव का पूरा वजूद जैसे एक सेकंड के दसवें हिस्से में सुन्न पड गया.

उसने पिछले तीन सालों से उस औरत के चेहरे को केवल अपनी यादों के उस हिस्से में देखा था जहां वह अपने गुस्से को खाद- पानी देता था. उसने सोचा था कि जब वह सामने आएगी, तो वह एक घमंडी, दौलत की भूखी औरत होगी जिसे वह दो मिनट में बेइज्जत करके बाहर फेंक देगा.

लेकिन सामने खडी यह लडकी.

देव की सांसें उसकी छाती में ही अटक गईं.

अनन्या के चेहरे की वह अलौकिक, पवित्र सादगी और उसकी आंखों का वह गहरा ठहराव सीधे देव की आंखों में जाकर चुभ गया. एक अजीब सी, अनजानी, और बेहद खतरनाक सिहरन देव की रीढ की हड्डी में बिजली के करंट की तरह दौड गई. यह अहसास इतना अचानक और इतना तीव्र था कि देव को खुद अपने ही जिस्म से घिन आने लगी.

यह क्या था? यह कौन सा अहसास था जो उस औरत को देखते ही उसके सीने में धडक उठा था जिससे उसे सिर्फ और सिर्फ नफरत करनी थी?

अनन्या ने धीमे, सधे हुए कदमों से हॉल के भीतर कदम रखा. उसके फ्लैट्स की कोई आवाज नहीं हुई, लेकिन उसके हर कदम के साथ उस कमरे की हवा और ज्यादा भारी होती चली गई.

वह टेबल के पास आकर रुकी. उसने कमरे में बैठे किसी भी रिश्तेदार की तरफ नहीं देखा. उसकी नजरें सीधे देव के उस दहकते हुए, सख्त चेहरे पर जाकर टिक गईं.

दोनो की नजरें मिलीं.

कमरे का तापमान जैसे शून्य से नीचे गिर गया.

देव की काली, खूंखार आंखों में जहां नफरत और आग का बवंडर था, वहीं अनन्या की बादामी आंखों में एक अथााह, शांत समंदर था. न अनन्या ने अपनी पलकें झपकाईं, न देव ने अपनी नजरें हटाईं. उस एक खामोश पल में, बिना किसी लफ्ज के, उन दोनों के बीच एक अदृश्य जंग का ऐलान हो चुका था.

नमस्ते, Mister देशपांडे, अनन्या ने अपनी नजरें देव से हटाकर बहुत शालीनता से वकील की तरफ घुमाईं. उसकी आवाज में एक अजीब सा मीठा खुरदुरापन था जो सीधे सुनने वाले

के दिल पर असर करता था. मुझे देर हो गई, क्योंकि बाहर मौसम बहुत खराब है।

अ. अरे, कोई बात नहीं, बेटा. मेरा मतलब, Miss मल्होत्रा, देशपांडे ने राहत की सांस लेते हुए कहा. हम बस वसीयत के मुख्य अंश पर ही पहुंचे थे।

मुझे वसीयत के कागजात सुनने की जरूरत नहीं है, अनन्या ने अपना ब्रीफकेस टेबल पर रखते हुए बहुत शांत लहजे में कहा. जीजाजी. यानी Mister यशवर्धन ने अस्पताल में अपनी आखिरी सांस लेने से पहले मुझे सब कुछ बता दिया था. मैं यहां किसी दौलत पर हक जताने नहीं आई हूं।

तो फिर क्यों आई हो?

देव की आवाज किसी जंगली भेडिये की गुरराहट की तरह उभरी.

वह टेबल का चक्कर काटकर अनन्या के बिल्कुल सामने आ खडा हुआ. उन दोनों के बीच अब मुश्किल से दो फीट का फासला था.

देव का छह फीट से ऊंचा, चौडा, भारी बदन अनन्या के नाजुक वजूद पर किसी काली पहाडी की तरह छाया हुआ था. देव के जिस्म से उठती लेदर, सिगरेट और उसके अपने बदन की कच्ची, गर्म गंध सीधे अनन्या की सांसों में उतर रही थी. अनन्या की लिनन की साडी का पल्लू देव की जैकेट के बिल्कुल करीब हवा में हल्का सा थरथरा रहा था.

अनन्या ने धीरे से अपना सिर उठाया. उसे देव की आंखों में देखने के लिए अपनी गर्दन को थोडा ऊपर करना पडा. लेकिन उसके चेहरे पर डर का एक कतरा भी नहीं उभरा.

मैं यहां अपनी बहन को दिए गए एक आखिरी वादे को पूरा करने आई हूं, देव, अनन्या ने सीधे उसकी आंखों में झांकते हुए कहा. उसने' मिस्टर सिंघाडिया' नहीं कहा; उसने सीधे' देव' कहा. और उस एक नाम के उच्चारण ने देव के अंदर के सारे अंगारों को एक साथ भडका दिया.

मेरी मां के कातिलों का नाम अपनी जुबान पर लेने की हिम्मत मत करना! देव उसके चेहरे के और करीब झुक गया. उसकी भारी सांसें अनन्या के माथे और उसकी पलकों को छू रही थीं. तुम और तुम्हारी वह बहन. तुम दोनों इस घर के लिए सिर्फ एक बीमारी थीं. तुम्हारी बहन ने मेरे बाप को निगला, और अब तुम मुझे निगलने आई हो?

अनन्या की पलकें एक पल के लिए कांपीं. उसकी आंखों के गहरे समंदर में दर्द की एक बहुत बारीक, छिपी हुई लहर उठी और विलीन हो गई. उसने अपनी मुट्ठी को अपनी साडी

के पल्लू के नीचे बहुत कसकर भींच लिया.

कावेरी दीदी ने कभी किसी को नहीं निगला, देव, अनन्या की आवाज में कोई चीख नहीं थी, लेकिन उसमें एक ऐसा वजन था जो पत्थरों को भी चीर दे. लेकिन तुम्हारी इस नफरत ने. तुम्हारे इस अंधे गुस्से ने तुम्हें जरूर एक जिंदा लाश बना दिया है. और यकीन मानो, मुझे तुम्हारी इस सडी हुई सल्तनत का कोई शौक नहीं है. मैं यहां सिर्फ तीन साल के लिए हूं, क्योंकि यशवर्धन जी ने इस घर और इस ट्रस्ट की जिम्मेदारी मुझे सौंपी है. और जब तक यह कागज वैध हैं. इस घर में मेरी इजाजत के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलेगा।

तुम मुझे हुक्म दोगी? देव की आंखों में खून उतर आया.

उसने बिना सोचे, अपने बेकाबू गुस्से में अपना दायां हाथ आगे बढाया. उसकी उंगलियां अनन्या की नाजुक, गोरी कलाई को पकडने के लिए बढीं—वह उसे घसीटकर उस दरवाजे से बाहर फेंक देना चाहता था.

लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियों की पोर अनन्या की कलाई की खुली त्वचा से सिर्फ एक मिलीमीटर की दूरी पर आई.

हवा में कुछ ठहर गया.

अनन्या ने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा. वह हिली तक नहीं. उसने अपनी बडी, शांत आंखों से सीधे देव के उठते हुए हाथ को देखा, और फिर उसकी आंखों में देखा.

उसकी नजरों में कोई विनती नहीं थी, कोई खौफ नहीं था. वहां सिर्फ एक बेइंतहा, पवित्र गरिमा थी.

देव की उंगलियां हवा में ही जम गईं.

अनन्या की त्वचा से उठती चंदन और मोगरे की हल्की सी, प्राकृतिक खुशबू ने देव के नथुनों को छू लिया. उस खुशबू में एक ऐसा अजीब, रूहानी नशा था जिसने देव के दिमाग के सारे तारों को एक सेकंड के लिए शॉर्ट- सर्किट कर दिया. देव का हाथ कांप गया. उसके बदन के भीतर एक ऐसी आग सुलगी जो गुस्से की नहीं थी. वह एक भयानक, अस्वीकार्य, और पाप जैसी लगने वाली कशिश की आग थी.

नहीं!

देव के अंतर्मन ने चीख लगाई. यह औरत कावेरी की बहन है! यह मेरी सौतेली मां का खून है! मैं इसे छू भी कैसे सकता हूं? मैं इसके करीब आने के बारे में सोच भी कैसे सकता हूं?

एक भयानक, दमघोंटू' गिल्ट' (दोष- भाव) ने देव की छाती को भीतर से नोच डाला. उस अपराधबोध की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि देव को सांस लेने में तकलीफ होने लगी. उसने झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया, जैसे उसने किसी दहकते हुए अंगारे को छू लिया हो.

उसने अपनी मुट्ठी को अपनी जैकेट की जेब में इस कदर भींच लिया कि उसकी हड्डियां चटकने की आवाज आई.

हाथ मत उठाना, देव, अनन्या ने बहुत धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज में कहा, जो केवल देव तक पहुंची. उसकी आवाज में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी, रूह कंपा देने वाली चेतावनी थी. क्योंकि अगर तुमने मर्यादा की उस आखिरी लकीर को पार किया. तो तुम खुद अपनी नजरों में गिर जाओगे. और मैं जानती हूं, तुम जो भी हो, जितने भी बिगडे हुए और जाहिल हो. लेकिन तुम अंदर से इतने गिरे हुए नहीं हो।

देव के जबडे इतनी जोर से भिंचे कि उसके चेहरे की नसें फटने को हो गईं. उसे लगा कि वह इस औरत का गला घोंट देगा, या शायद. खुद अपनी छाती चीर लेगा ताकि उस अजीब सी बेचैनी को बाहर निकाल सके जो इस औरत के सामने आते ही उसके दिल में रेंगने लगी थी.

तुम बहुत बडी गलती कर रही हो, अनन्या मल्होत्रा, देव ने अपने लफ्जों को चबाते हुए कहा. उसकी आवाज अब किसी जहरीले सांप की फुफकार जैसी थी. तुम इस नरक में अपनी मर्जी से आई हो. लेकिन यहां से जाने का रास्ता तुम्हारी मर्जी से तय नहीं होगा. मैं तुम्हारी जिंदगी को इस घर के भीतर इतना बदतर बना दूंगा कि तुम खुद अपने घुटनों पर बैठकर इस वसीयत को फाडने की भीख मांगोगी।

अनन्या के चेहरे पर एक बहुत हल्की, फीकी मुस्कान तैर गई—एक ऐसी मुस्कान जिसमें किसी जंग को जीतने का घमंड नहीं, बल्कि अपनी बर्बादी को कुबूल करने का सुकून था.

मैं कांटों पर चलने की आदत बहुत पहले डाल चुकी हूं, Mister सिंघाडिया, अनन्या ने कहा. उसने अपना ब्रीफकेस उठाया. देशपांडे जी, मुझे मेरा कमरा दिखा दीजिए. मैं बहुत थक चुकी हूं।

अ. हां, बिल्कुल बेटा. ऊपर, पहली मंजिल पर जो ईस्ट विंग का गेस्ट Room है. देशपांडे ने जल्दी से कहा, इस खौफनाक तनाव से निकलने के लिए छटपटाते हुए.

ईस्ट विंग नहीं, देव की आवाज ने पूरे कमरे को फिर से जमा दिया.

सबने चौंककर देव को देखा.

देव ने अपनी ठंडी, जलती हुई नजरें अनन्या के चेहरे पर गडा दीं.

वेस्ट विंग, देव ने कहा. उसके लफ्जों में एक क्रूर, सोची- समझी साजिश की गंध थी. मास्टर बेडरूम के ठीक सामने वाला कमरा. जहां से हर सुबह और हर रात. तुम्हारी नजरें मेरे दरवाजे पर पडें. मैं देखना चाहता हूं कि तुम्हारी यह पवित्रता, तुम्हारा यह फर्जी संन्यास मेरे गुस्से के सामने कितने दिन टिकता है।

अनन्या की सांस एक पल के लिए रुकी.

वेस्ट विंग.

वह जानती थी कि वेस्ट विंग में सिर्फ देव का कमरा था. पूरा विंग खाली रहता था क्योंकि देव किसी को भी अपने इलाके में बर्दाश्त नहीं करता था. वहां रहने का मतलब था—हर पल, हर सांस उस लडके के साए में बिताना, जिसकी मौजूदगी ही हवा में आग लगा देती थी.

अनन्या ने देव की आंखों में देखा. वहां एक खुली चुनौती थी. एक ऐसा जाल था जिसमें देव उसे खींचना चाहता था ताकि वह डरकर भाग जाए.

लेकिन अनन्या भागी नहीं. उसने अपनी गर्दन सीधी रखी. उसकी बादामी आंखों में एक शांत, अटूट संकल्प उतर आया.

ठीक है, अनन्या ने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा. वेस्ट विंग ही सही।

वह मुडी. उसकी साडी का पल्लू फर्श पर एक हल्की सी सरसराहट छोडता हुआ सीढियों की तरफ बढ गया. उसने पीछे मुडकर एक बार भी नहीं देखा.

हॉल में खडे रिश्तेदार एक- दूसरे का मुंह ताक रहे थे. देशपांडे ने चुपचाप अपनी फाइलें समेटीं और बिना कुछ बोले वहां से खिसक लिए. एक- एक करके सारे रिश्तेदार भी फुसफुसाते हुए, अपनी- अपनी गाडियों की तरफ भागने लगे. कोई भी उस हवेली में नहीं रुकना चाहता था जहां अब बारूद बिछ चुका था.

पूरा हॉल खाली हो गया.

सिर्फ देव खडा रहा.

फर्श पर कांच के टूटे हुए टुकडे बिखरे थे. हवा में अब भी चंदन और मोगरे की वह खुशबू तैर रही थी—अनन्या की खुशबू.

देव ने अपनी दोनों हथेलियों से अपना सिर पकड लिया. उसकी छाती इस कदर धडक रही

थी मानो पसलियां तोडकर बाहर आ जाएगी.

उसने उस खाली सीढी को देखा जहां से कुछ देर पहले वह औरत ऊपर गई थी.

वह उसकी सौतेली मां की बहन थी.

यह ख्याल आते ही देव के अंदर एक भयानक, चीखता हुआ अपराधबोध जागा. उसने टेबल पर अपनी पूरी ताकत से लात मारी. भारी महोगनी की टेबल दो फीट पीछे खिसक गई और उस पर रखी फाइलें हवा में बिखर गईं.

नहीं. नहीं! देव पागलों की तरह गुर्राया.

उसने अपनी जेब से लाइटर निकाला और अपनी उंगलियों को उस लौ के ऊपर रख दिया. नीली आग उसकी त्वचा को छूने लगी. दर्द की एक तीखी लहर उसकी नसों में दौडी, लेकिन उस जिस्मानी दर्द से भी ज्यादा भयानक वह दर्द था जो उसके सीने के भीतर सुलग रहा था.

वह उस औरत से नफरत करना चाहता था. वह उसे बर्बाद करना चाहता था.

लेकिन उस पहले ही लम्हे में, उसकी आत्मा ने जो गुनाह महसूस किया था. उस गुनाह की आग अब इस पूरे मेंशन को राख करने वाली थी.

ऊपर, वेस्ट विंग के उस बडे, ठंडे कमरे में.

अनन्या ने दरवाजा भीतर से बंद कर लिया. उसने दरवाजे की लकडी से अपनी पीठ टिका दी.

जैसे ही वह अकेली हुई, उसके चेहरे का वह मजबूत, शांत नकाब एक झटके में चकनाचूर हो गया. उसके घुटने मुड गए और वह धीरे- धीरे फिसलती हुई फर्श पर बैठ गई.

उसने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया. उसकी उंगलियां बुरी तरह कांप रही थीं. उसकी छाती से एक टूटी हुई, बेबस सिसकी बाहर निकल आई.

दीदी. अनन्या ने अंधेरे कमरे में अपनी मरी हुई बहन को पुकारा. उसके आंसुओं ने उसकी बादामी साडी के पल्लू को भिगो दिया. मैं कहां आ गई हूं? आपने मुझे Kiss आग में झोंक दिया?

अनन्या की आंखों के सामने बार- बार देव का वह चेहरा घूम रहा था.

वे खूंखार, काली आंखें. वे तराशे हुए जबडे. और वह लम्हा जब देव की उंगलियां उसकी कलाई को छूने ही वाली थीं.

अनन्या ने अपनी कलाई को देखा. वहां कोई निशान नहीं था, लेकिन उस जगह पर अब भी

एक अजीब सी, दहकती हुई जलन महसूस हो रही थी. उस लडके की मौजूदगी में कोई ऐसी आदिम, जंगली ताकत थी जिसने अनन्या के भीतर बरसों से सोई हुई एक औरत को झकझोर कर रख दिया था.

और यही बात अनन्या को अंदर से मार रही थी.

वह देव था. उसकी दीदी का सौतेला बेटा.

भले ही उनके बीच खून का कोई रिश्ता नहीं था. भले ही वे एक- दूसरे के लिए अजनबी थे. लेकिन यह समाज, यह दुनिया, और उसकी अपनी ...

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